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आँधियाँ जारी है...कुछ ज़िम्मेदारी निभाने की हमारी भी बारी है....यहाँ पेशाब करना मना है...लिखा है, वहां पेशाब करो,यहाँ पार्किंग न करें...लिखा है, वहाँ पार्किंग करो,

"आँधियाँ जारी है...कुछ ज़िम्मेदारी निभाने की हमारी भी बारी है....
यहाँ पेशाब करना मना है...लिखा है, वहां पेशाब करो,
यहाँ पार्किंग न करें...लिखा है, वहाँ पार्किंग करो,
घर से बाहर अनावश्यक न निकलें की अपील डेढ़ साल से सुन रहे हैं, फिर भी कई बार बकलोली करने बाहर जायेंगे ही,
मास्क पहनें, कब से सुन रहे हैं...कई जगह तो कुत्ते तक को उनके मालिक मास्क पहनाये नज़र आ गये, पर हम तो इंसान हैं! क्यों मास्क पहनें?
क्यों सेनेटाइजर लगाएँ? क्यों हाथ धोयें? क्यों भीड़ में बैठें?

भई, हमारी मर्ज़ी, हमारा जीवन है...
हमने चुना है न, गाँव के सरपंच को, क्षेत्र की विधायक को, लोकसभा क्षेत्र के सांसद को, राज्य के CM को और देश के PM को,
वो किसलिये हैं?

हम लापरवाही से भुगतेंगे, औरों की जान को ख़तरे में डालेंगे,
पर ठीकरा इन जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों पर फोड़ेंगे,

हम निवेदन की बात नहीं सुनेंगे, वो बार-बार परिवार से दूर हमारी जान बचाने एनाउंसमेंट करेंगे,
हम प्यार की भाषा नहीं सुनेंगे,
पर ठीकरा इन जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों पर फोड़ेंगे,

हम अपनी ज़िम्मेदार नागरिक की भूमिका नहीं निभायेंगे,
कोरोना के मानकों को रौंदेंगे,
सीमित मेडिकल सुविधाओं को जानने के बावजूद वहाँ के मरीज बनने अपनी लापरवाही से तत्पर रहेंगे, पर जब उसी अस्पताल में बेड नहीं मिलेगी,
तो ठीकरा इन डॉक्टरों, जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों पर फोड़ेंगे,

हम लोग हैं क्या? कर क्या रहे हैं?
जानते हैं,
कि जब अस्पताल में 1000 बेड है,
और अचानक मरीज 1500 हो जायें, 
तो अस्पताल, अधिकारी, भला कैसे मैनेज करेंगे?

काम करने वाले स्वास्थ्य कर्मी, नर्स, डॉक्टर्स सीमित हैं,
फ़िर अचानक वैश्विक संकट के समय ये सँख्या डबल कैसे हो पायेगी?

लेकिन हमें क्या?
हम तो कोसेंगे...
मुख्यमंत्री को,
प्रधानमंत्री को,
मीडिया को,
पुलिसकर्मियों को,
और डॉक्टर्स को....

पर हाँ, 
भई, हम तो मनमाफिक चीजें करेंगे,
सुधरेंगे बस नहीं।

(नोट : ये पोस्ट लापरवाह मेडिकल स्टाफ़, गैरजिम्मेदार जनप्रतिनिधियों, शून्य अधिकारियों को सही नहीं बताता, न ही ऐसे निकम्मे लोगों का पक्ष लेता है, पर हां, कई वॉरियर्स हैं, जो आपके हमारे लिये अपनों से दूर रहकर ख़ुदको झोंककर काम में लगे हैं। साथ ही उन गैरज़िम्मेदार लोगों को व्यंग्य है, जो अपने नागरिक होने की ज़िम्मेदारी नहीं निभा रहे हैं।
अच्छा काम करने वालों, कोरोना वॉरियर्स रुपी नायकों, अपने परिजनों की ख़ातिर ही सही, खुदका ध्यान रखें। अपनी ज़िम्मेदारी समझकर जबरन संक्रमण का शिकार होने की कोशिश न करें। ज़िम्मेदारों के प्रति संवेदनशीलता दिखायें।
कोरोना रुपी आंधी चल रही है, थोड़ा ठहर जाएँ, आँधी गुज़रने दें, वो गुज़र जायेगा, फ़िर सब बेहतर नज़र आयेगा।
केवल और केवल शिकायतों का पुलिंदा लेकर ही व्यवस्था सम्हालने वालों को कोसें नहीं, बल्कि ख़ुद को भी समझाएं, अपनों को समझाएं-'कि बस कुछ दिन ठहर जा यार....बेहतर करने, बेहतर बन जा यार)

जय हिंद।"

(

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