*महिला सम्बन्धी कानूनों के दुरूपयोग पर माननीय छ. ग. उच्च न्यायालय का कड़ा रुख:*
छ. ग. के नवीन जिला सक्ती का एक मामला हालही में सामने आया। यहाँ एक अविवाहित लड़की ने थाना सक्ती में पहले दिनांक 20.09.2020 और अब दिनांक 24.11.2022 को लगातार दो-बार एक ही आरोपी के विरुद्ध उसी थाने में भारतीय दण्ड संहिता की धारा 376, पॉक्सो एक्ट की धारा 6, 13 आई टी एक्ट की धारा 67(ख) और अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम की धारा 3(2-5) के तहत अपराध दर्ज कराया जिसमे आरोपी दोषमुक्त हुआ परन्तु उसे मामले के विचारण के दौरान कुल 394-दिन अभिरक्षा में बिताने पड़े।
विचारण के दौरान शिकायतकर्ता लड़की एवं उसके माता-पिता ने माना कि लड़की की उम्र 18-वर्ष से ज्यादा है और उन्होंने आरोपी के पिता के साथ एक पुराने विवाद के कारण आरोपी पर यह जुर्म दर्ज कराया था। इस मामले में लड़की को राज्य शासन से मुआवजा भी दिलाया गया था। दूसरी बार उसी अविवाहित लड़की ने उसी आरोपी के विरुद्ध उसी थाने में भारतीय दण्ड संहिता की धारा 376, 450 पॉक्सो एक्ट की धारा 4 और अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम की धारा 3(2-5) के तहत अपराध दर्ज कराया जिसमे आरोपी को दोबारा अभिरक्षा में लिया गया। परन्तु इस बार आरोपी की जमानत के लिए अधिवक्ता शीतल सोनी के माध्यम से आवेदन किया गया और सुनवाई के दौरान अधिवक्ता (श्रीमति.) सोनी के तीखे सवालों के बाद माननीय छ. ग. उच्च न्यायालय का कड़ा रुख सामने आया और राज्य की ओर से उपस्थित अधिवक्ता को फटकार लगाते हुए माननीय न्यायालय ने पूछ ही लिया कि, यदि कोई लड़की सन-2020 में 18 वर्ष की हो चुकी थी तो आज सन-2023 में फिर से नाबालिग कैसे हो सकती है? तथा आरोपी को जमानत का लाभ दिया गया। मामले में अधिवक्ता शीतल सोनी की बहस तर्कसंगत एवं प्रशंसनीय रहे।
_*Case Title: Tarun Sahu Vs. The State of Chhattisgarh; Decided On 20.04.2023*_
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