रायपुर। छत्तीसगढ़ में धान खरीदी व्यवस्था को लेकर जो सवाल उठ रहे थे, अब वही सवाल सरकार के फैसले पर भी चस्पा हो गए हैं। महीनों तक चली अव्यवस्थित खरीदी के बाद सरकार ने अचानक तारीख बढ़ाने का फैसला लिया है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने धान खरीदी की अवधि 5 फरवरी तक बढ़ाने की घोषणा की है।
सरकार इसे “किसानों के हित में फैसला” बता रही है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और कहानी कहती है। सवाल यह है कि अगर व्यवस्था दुरुस्त थी, तो फिर सैकड़ों किसान दो महीने तक भटकते क्यों रहे?
क्या यह वही तरीका नहीं, जो अक्सर पुलिस-प्रशासन अपनाता है—पहले चूक, फिर लीपापोती?
❗ टोकन सिस्टम बना मज़ाक
धान खरीदी केंद्रों पर टोकन व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई। आखिरी दिनों में किसानों की भीड़ उमड़ी, घंटों लाइन में खड़े रहने के बाद भी कई किसानों का नंबर नहीं आया। 31 जनवरी तक टोकन के सहारे खरीदी चली, फिर भी दर्जनों केंद्रों से किसान खाली हाथ लौटते रहे।
❗ अब सिर्फ “वंचित” किसानों से खरीदी—कौन तय करेगा?
सरकार कह रही है कि बढ़ाई गई अवधि में केवल उन्हीं किसानों से धान खरीदा जाएगा जो पहले वंचित रह गए थे। लेकिन बड़ा सवाल यह है—
👉 वंचित की सूची किसने बनाई?
👉 क्या वही अधिकारी तय करेंगे, जिनकी लापरवाही से किसान वंचित हुए?
❗ दोषियों पर कार्रवाई क्यों नहीं?
अगर धान खरीदी में अव्यवस्था हुई, तो जिम्मेदार कौन है?
अब तक किसी भी अधिकारी या एजेंसी पर कार्रवाई की खबर सामने नहीं आई। सिर्फ तारीख बढ़ाकर सरकार क्या अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ रही है?
धान खरीदी की तारीख बढ़ाना राहत कम और सरकारी सिस्टम की नाकामी पर लगाया गया अस्थायी मरहम ज्यादा नजर आ रहा है। किसान पूछ रहे हैं—
क्या दो दिन में महीनों की लापरवाही का हिसाब चुकता हो जाएगा?
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