बांकीमोंगरा (कोरबा):
केंद्र और राज्य सरकार भले ही “कोई गरीब भूखा न रहे” का दावा कर रही हों, लेकिन हकीकत में नगर पालिका परिषद बांकीमोंगरा क्षेत्र में इन दावों की पोल खुलती नजर आ रही है। यहां राशन कार्डधारी अपने ही हक के अनाज के लिए भटकने को मजबूर हैं।
📌 नियमों की खुलेआम अनदेखी
सरकारी नियमों के अनुसार हर राशन दुकान को हर माह की 6–7 तारीख से महीने के अंतिम दिन तक खुला रहना चाहिए। लेकिन जमीनी सच्चाई इससे उलट है—
➡️ कई इलाकों में राशन दुकानें अक्सर बंद मिलती हैं
➡️ मजदूरी छोड़कर आए ग्रामीण खाली हाथ लौट रहे हैं
🍚 किस्तों में राशन – सबसे बड़ी समस्या
हितग्राहियों का आरोप है कि उन्हें पूरा राशन एक साथ नहीं दिया जा रहा—
आज सिर्फ चावल
शक्कर, चना या नमक गायब
दुकानदारों का जवाब: “ऊपर से माल नहीं आया, अगले महीने आना”
⚠️ जबकि दुकान पर साफ लिखा रहता है—
“इसी माह का राशन उठाएं, अगले माह नहीं मिलेगा”
ऐसे में जो राशन नहीं मिला, वह लैप्स हो जाता है, और नुकसान सीधा गरीब परिवारों को उठाना पड़ता है।
✊ युवा कांग्रेस ने खोला मोर्चा
जिला युवा कांग्रेस कोरबा ग्रामीण के जिलाध्यक्ष विकास सिंह ने मामले पर कड़ा सवाल उठाते हुए कहा—
“खाद्य विभाग को जमीनी हकीकत की समीक्षा करनी चाहिए। अगर किसी दुकान में स्टॉक कम है या भीड़ अधिक है, तो बचे हितग्राहियों को अगले माह राशन उठाने का अवसर मिलना चाहिए। हर गरीब को उसका पूरा हक मिलना ही चाहिए।”
❓ प्रशासन की चुप्पी पर सवाल
अब बड़ा सवाल यह है कि—
खाद्य विभाग की नजर इन दुकानों पर क्यों नहीं?
क्या संचालकों की मनमानी को अधिकारियों का मौन समर्थन है?
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