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मनरेगा पर हमला : संविधान के सामाजिक न्याय के मूल भाव से पीछे हटती सरकार।

AM अबतक न्यूज़
नई दिल्ली/विशेष संवाददाता — केंद्र सरकार द्वारा संसद में बहुमत के बल पर महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) को कमजोर किए जाने को लेकर देशभर में तीखी प्रतिक्रिया सामने आ रही है। विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि नया कानून मनरेगा की आत्मा को ही खत्म करता है और यह सीधे तौर पर ग्रामीण गरीबों के अधिकारों पर हमला है। संविधान के अनुच्छेद 41 में राज्य को नागरिकों को काम का अधिकार सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया है। यही भावना मनरेगा कानून की आत्मा थी, जिसे वर्ष 2005 में व्यापक राजनीतिक सहमति के साथ लागू किया गया था। यह कानून ग्रामीण परिवारों को न्यूनतम 100 दिन का रोजगार देने की गारंटी देता था और मांग आधारित व्यवस्था के तहत कार्य उपलब्ध कराता था। लेकिन अब केंद्र सरकार द्वारा लाए गए नए प्रावधानों में इस मूल अवधारणा को ही कमजोर कर दिया गया है। अब मनरेगा को मांग आधारित न रखकर “वित्तीय सीमा आधारित” बनाया जा रहा है, जिससे केंद्र सरकार की जिम्मेदारी लगभग समाप्त हो जाती है। राज्यों पर 40 प्रतिशत तक खर्च का बोझ डाल दिया गया है, जबकि वे पहले से ही आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह कानून संघीय ढांचे पर भी चोट है। परियोजनाओं की योजना, क्रियान्वयन और निगरानी पूरी तरह केंद्र के नियंत्रण में लाई जा रही है, जिससे पंचायतों की भूमिका लगभग समाप्त हो जाएगी। साथ ही, आधार आधारित उपस्थिति और डिजिटल प्रक्रियाएं ग्रामीण क्षेत्रों में तकनीकी समस्याओं के कारण मज़दूरों के लिए नई परेशानियां खड़ी करेंगी। महिलाओं, दलितों और आदिवासियों पर इसका सबसे अधिक असर पड़ेगा। आँकड़ों के अनुसार मनरेगा में काम करने वालों में 50 प्रतिशत से अधिक महिलाएं हैं, जबकि अनुसूचित जाति और जनजाति की भागीदारी भी बेहद अधिक है। इसके बावजूद नए कानून में इनके प्रतिनिधित्व और शिकायत निवारण की व्यवस्था को कमजोर किया गया है। आलोचकों का कहना है कि जिस कानून ने ग्रामीण गरीबों को न्यूनतम सुरक्षा दी थी, वही अब धीरे-धीरे समाप्त किया जा रहा है। वर्ष 2024-25 में 8.9 करोड़ लोगों ने काम मांगा, लेकिन लगभग एक करोड़ लोगों को काम नहीं मिल सका। मजदूरी भुगतान में देरी और बकाया की राशि हजारों करोड़ तक पहुंच गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल एक कानून में बदलाव नहीं, बल्कि संविधान के नीति-निर्देशक सिद्धांतों पर सीधा प्रहार है। ग्रामीण भारत के लिए मनरेगा जीवनरेखा थी, जिसे मजबूत करने के बजाय कमजोर करना सामाजिक न्याय के मूल विचार के विरुद्ध है।

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